तद्भव शब्द किसे कहते हैं

तद्भव शब्द: संस्कृत से जन्मे हिंदी के शब्द

हिंदी भाषा में दो प्रकार के शब्द होते हैं: तत्सम और तद्भव। तत्सम शब्द वे हैं जो संस्कृत से हूबहू उधार लिए गए हैं, जैसे कि ‘पुस्तक’, ‘विद्यालय’, ‘आत्मा’ आदि। दूसरी ओर, तद्भव शब्द वे हैं जो संस्कृत शब्दों से विकसित हुए हैं, लेकिन समय के साथ उनमें परिवर्तन आ गया है, जैसे कि ‘पढ़ना’ (पठन), ‘देना’ (दान), ‘भाई’ (भ्रातृ) आदि।

तद्भव शब्दों की विशेषताएं:

  • उच्चारण में परिवर्तन: तत्सम शब्दों के उच्चारण में परिवर्तन होकर तद्भव शब्द बनते हैं। जैसे कि ‘पुस्तक’ (पोथी), ‘विद्यालय’ (स्कूल), ‘आत्मा’ (आत्मा) आदि।
  • वर्णों का लोप: तद्भव शब्दों में कुछ वर्णों का लोप हो जाता है। जैसे कि ‘पठन’ (पढ़ना), ‘दान’ (देना), ‘भ्रातृ’ (भाई) आदि।
  • अर्थ में परिवर्तन: तद्भव शब्दों का अर्थ भी संस्कृत शब्दों से थोड़ा बदल सकता है। जैसे कि ‘ज्ञान’ (समझ), ‘कर्म’ (काम), ‘दृष्टि’ (देखना) आदि।

तद्भव शब्दों के उदाहरण:

  • संज्ञा: किताब, घर, आँख, पानी, हाथ, माँ, बाप, गाय, कुत्ता
  • क्रिया: पढ़ना, लिखना, बोलना, खाना, पीना, सोना, उठना, चलना, दौड़ना
  • विशेषण: अच्छा, बुरा, छोटा, बड़ा, काला, सफेद, लाल, नीला, हरा

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तद्भव शब्दों का महत्व:

तद्भव शब्द हिंदी भाषा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे भाषा को समृद्ध बनाते हैं और इसे संस्कृत से जोड़ते हैं। तद्भव शब्दों के अध्ययन से हमें हिंदी भाषा के विकास को समझने में मदद मिलती है।

निष्कर्ष:

तद्भव शब्द हिंदी भाषा की रीढ़ की हड्डी हैं। वे भाषा को सरल, सुगम और बोधगम्य बनाते हैं। तद्भव शब्दों का अध्ययन हमें हिंदी भाषा की गहराई को समझने में मदद करता है।