पल्लवन किसे कहते हैं PALLAVAN KISE KAHATE HAIN

पल्लवन किसे कहते हैं – PALLAVAN KISE KAHATE HAIN

दोस्तों आज हम इस POST के अंदर पल्लवन किसे कहते हैं? PALLAVAN KISE KAHATE HAIN. उसकी परिभाषा एवं विशेषता , गुण के साथ संबंधित कई ऐसी चीजे जो आप नही जानते उन्हें भी चर्चा करेंगे। ओर हां पल्लवन करने हेतु कुछ मुख्य नियमों को भी नीचे बताया है।

तो अब चलिए बिना समय गंवाए स्टार्ट करे अपना लेख!पल्लवन किसे कहते हैं? PALLAVAN KISE KAHATE HAIN. उसकी परिभाषा एवं विशेषता , गुण के साथ संबंधित कई ऐसी चीजे जो आप नही जानते उन्हें

 

ऐसी लघु रचना को पल्लवन जाता है, जिसमें किसी पंक्ति, कहावत या लोकोक्ति के प्रमुख भाव एवं विचार को विस्तार से बताया जाता हैं।

 

पल्लवन की परिभाषा

PALLAVAN KI DEFINATION! जब भी किसी सुगठित विचार या भाव को विशाल रूप में विस्तार किया जाए, उसे पल्लवन कहते हैं।

 

पल्लवन का शब्दिक मतलब है – विस्तार, फैलावा (हिन्दी में पल्लवन) एवं अंग्रेजी के EXPANSION का पर्याय है।

आपको बता दें कि छोटी छोटी पंक्तियों में लिखे या एक वाक्य या कोई एक विचार इतने अच्छे से स्पष्ट नही समझ आते और यह हर तरह के लोगो को समझ आए यह जरूरी नहीं है ।

आपको बता दें कि विशेष लेखक अपने शब्दों को सजाकर कम शब्दों में लिखने के प्रयास अवश्य करते हैं। लेखन में जब गागर में सागर जैसी क्रिया होती है तो साधारण लोगो को उसके अर्थ को समझ पाना उतना सरल कार्य नही होता हैं। अब इस अवस्था में लेबल विचार या भाव को अलग करके व्याख्या स्वरूप में जानने की आवश्यकता होती हैं।

 

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इतना ही नही, हिंदी में कई ऐसी कहावत प्रचलित है जिनके अर्थ को साधारण लोगो द्वारा समझ पाना संभव नही हैं लेकिन जब उसे व्यक्त करना ही तो स्पष्ट स्वरूप में समझा जा सकता है, उसे पल्लवन कहते हैं।

 

इसे हम अंग्रेजी भाषा की शब्दावली में “Miniature essay” बोलते है एवम हिन्दी में लघु निबन्ध कहते हैं।

इसके द्वारा वाक्य या बात को अपने विचार सूत्रों की सहायता से समझने की कोशिश को जाति है।

इस समय यह विशेष को देखा जाता है की छात्रों द्वारा या समझने वाले लोगों उसे इस तरह अनुसरण कर रहे हैं।

या इसे समझ पाने में सक्षम है या नहीं। इसके बात उस भाषा को गहराई से एवं आसान करके सुस्पष्ट किया जा सकता हैं।

 

पल्लवन के कुछ साधारण नियम

 

1. पल्लवन में मूल अवतरण के वाक्य, सूक्ति, लोकोक्ति या कहावत को अच्छे से पढ़िए, जिससे मुख्य भाव को पकड़ा जा सके.

2. मूल विचार या मुख्य भाव के अंदर कई सहायक छोटे छोटे विचार होते हैं उन्हें भी जानने और समझने के लिए विचार करें।

3. मूल और गौण भाव के विचारों को जानने लेने के पश्चात अलग अलग करके हर विचार को अनुच्छेद में लिखने के लिख शुरुआत करे। और ध्यान में रखे की कोई भाव छूटे नही।

4. अर्थ या विचार को विशाल रूप से विस्तार करते वक्त यह जानना चाहिए की ऊपर जिस तथ्य को जोड़ा गया है वह जरूरी और संबंध रखता हैं।

5. लेखन में भाव और भाषा की अभिव्यक्ति को ध्यान में रखकर स्पष्ट, सरल एवं मौलिक बनाने को चेष्टा की जानी चाहिए। जटिल भाषा या अलंकृत शैल में कठिन लिखने से बचना चाहिए।

6. जब भी पल्लवन लेखन अन्य अप्रासंगिक विचारों का भाव आए तो अनावश्यक विस्तार या उल्लेख को लिखने से बचना चाहिए।
7. पल्लवन में लेखक को मूल , गौण भाव या विचार की टिप्पणी और आलोचना न कटे हुए अपने मन के भाव स्वरूप है बिंदु के विस्तार और विश्लेषण तरीके से समझने की चेष्टा की जाए।
8. पल्लवन की रचना करते समय हमें अन्यपुरुष वाली बात को ध्यान में रखकर को जाएं।
9. पल्लवन व्यास शैली में होकर, समासशैली की नहीं ! यानी इसमें बातों या विचारों या भावों को विस्तार से लिखने हेतु अभ्यास होना चाहिए।

 

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पल्ल्वन के उद्देश्य

कुछ ऐसे पल्लवन के उद्देश्य जो कि विशेष महत्व रखते हैं उन्हें हम नीचे बता रहे हैं–

  • * मूल विचार को स्पष्ट करना और उसके साथ सहायक विचारों को, भावों को मध्य में समेटे हुए चलना।
  • * भाव और भाषा की अभिव्यक्ति स्पष्ट होनी चाहिए और सरलता के साथ मौलिक रूप भी अवश्य चाहिए।
  • * पल्लवन हेतु मूल उद्देश्य मूल विचार का विस्तार पूर्वक विश्लेषण हो।
  • * मुख्य विचार की पुष्टि करने के लिए सहायक उदाहरण को जोड़ना उचित विचार है।
  • * उन मूल उद्देश्य और गुण विचारों को पल्लवन से पहले समझ लेना और उसके सहायक विचारों को पहले ही जान लेना ताकि ऐसे कोई वाक्य, विचार और प्रसंग छूटे नहीं।

 

पल्लवन की विशेषताएं और गुण

1. पल्लवन की स्पष्टता
पल्लवन के द्वारा ऐसे विचार को स्पष्ट रूप प्रदान किया जाता है और हर तरह से चिंतन एवं मनन करने के बाद ही रूपरेखा तैयार की लाती हैं।

जिसमे हर विचार या भाव की संभावना तो नही रहती लेकिन मूल भाव के कुछ संबंधित उदाहरण का उपयोग करके स्पष्टता इसका गुण होता हैं।

 

2. सरलता और सटीकता
सरलता का गुण पल्लवन को आसन बनाता है जो छोटे छोटे पात्रों या विचार को साधारण शब्दों में लिखा जाता हैं।

कठिन अलंकृत शब्दों का इस्तेमाल करना नहीं चाहिए एवं व्यर्थ के अन्य ऐसे विचार जो पाठकों के लिए कठिन हो, ऐसे शब्दों का इस्तेमाल जो कठिन जटिलता से समझाएं गए हो उन्हें सरल कर लिखना चाहिए।

 

3. संक्षिप्तता का गुण
हां, विचारों को ध्यान पूर्ण विस्तार किया जाता है लेकिन इतना भी है की जिसकी जरूरत न हो उस अनावश्यक विषय को जोड़ा जाए जो संबंध न रखता हैं।

व्यर्थ की टिप्पणी एवं तर्क को स्थान नही दिया जाता हैं।

संक्षिप्तता का गुण से विरोधी प्रकार के कोई भी तर्क नही लिखना टी।

 

4. पल्लवन में, कथ्य और शिल्प का सुव्यवस्थित रूप
कथ्य और शिल्प को सुव्यवस्थित और सटीक पल्लवन में इसका स्वरूप सरल होता है। इसके तहत हर शब्द को समझाना ही नहीं,

बल्कि उसके अंदर आने वाले मुख्य भागों या फिर प्रसंगों को क्रमबद्ध तरीके से पाठकों तक सक्षम कर पहुंचाना।

और ऐसे वाक्यों का चयन करना जो की सटीक और सरल होते हैं जो कथ्य और शिल्प की सुव्यवस्थित रूप से सजाए गए हो।

 

5. उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष की जगह अन्य पुरुष शैली
उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष कई स्थानों पर पल्लवन में हमेशा अन्य पुरुष का ही उपयोग हो।

अन्य पुरुष शैली का उपयोग सरलता एवं सहज गुण प्रधान कर अन्य पुरुष शैली प्रयोग में लाई जाए।

 

6. आलोचना और टीका-टिप्पणी का निषेध
ऐसी आलोचना टिप्पणियों को पल्लवन में लिखना वर्जित है या बंद है। जो किसी भी मतलब या विचार की आलोचना की जाए।

कोई ऐसे वाक्य जो मुख्य विचार उससे उसकी स्थिति को भटका दे, ऐसे विचारों को पल्लवन में नहीं लिखे जाते हैं।

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पल्लवन, व्याख्या और भावार्थ में अंतर

हमें पल्लवन, व्याख्या और भावार्थ के प्रमुख तात्त्विक अन्तर जानना बहुत जरूरी हैं।

पल्लवन और व्याख्या दोनों में सत्रिहित भाव या विचार का विशाल रूप से विस्तार मिलता है; पर पल्लवन में देखा जाएं तो केवल निहित भाव ही विस्तार पता है,

और व्याख्या में प्रसंगनिर्देश हेतु आलोचना तथा टीका-टिप्पणी हेतु स्थान सुरक्षित बना राहत है। ऐसी किस तरह की छूट पल्लवन के तहत नहीं होती है।

पल्लवन और व्याख्या दोनों में मुख्य भाव या मूल विचारों को स्पष्ट किया जाता है। पर भावार्थ में भाव विस्तार की अपनी सीमा रहती है।

देखा जाय तो पल्लवन हेतु सीमा का कोई ऐसा कोई बन्धन नहीं।

यहाँ अलग अलग अनुच्छेदों में उस समय तक लिखा जायेगा, जब तक मुख्य भाव के समस्त मनोभाव को सही तरीके से स्पष्ट न हो जाए।

जबकि भावार्थ में मूलभाव को अनुच्छेदों में विस्तार से लिखने को कोई आवश्यक नहीं हैं। भावार्थ में तो लेबल मूल आवरण के केन्द्रीय भाव को पकड़ने की जरूरत होती हैं।

वही इसके विपरीत, पल्लवन में मूल और गौण दोनों तरह के निहित भावों या विचारों को जानना जरूरी रहता हैं। पल्लवन, संक्षेपण का ठीक विपरित या उल्टा है।

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पल्लवन के उदाहरण : इंटरनेट पर खोज करने पर पल्लवन के कई उदाहरण मिल जाते हैं। लेकिन फिर भी यदि आप चाहते हो कि

हम इस आर्टिकल में पल्लवन के उदाहरणों को भी जोड़ें

हालांकि उदाहरण जोड़ने से यह आर्टिकल और बड़ा रूप ले लेगा इसलिए हमने सटीकता को ध्यान में रखते हुए उदाहरणों को शामिल अभी नहीं किया है।

आने वाले समय में हम पल्लवन के ढेरों उदाहरण, आपके लिए इस आर्टिकल या हमारे हम लोग पर उपलब्ध करा देंगे।

आप उन्हें खोज बॉक्स में आसानी से खोज पाएंगे।

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पल्लवन का यह आर्टिकल जिसमें बताया है। हमने पल्लवन किसे कहते हैं। पल्लवन की विशेषताओं और इसके गुण के साथ इसकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखा गया है।

यह आर्टिकल आपको कैसा लगा हमें अवश्य बताएं, और इसे अपने दोस्तों को शेयर करने से ना चुके।

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